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उज्जैन के पिछले 10 सिंहस्थ की विशेष घटनाएं/विवाद

सोमवार,अप्रैल 25, 2016
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विक्रम की नगरी उज्जैन में महाकाल का सुप्रसिद्ध मंदिर है। देश के अन्य किसी भाग में महाकाल का कोई मंदिर नहीं है। अत: निश्चय ही यह प्रश्न उपस्थित होता है कि यह 'महाकाल' कौन देवता हैं जिसका केवल देशभर में एक मंदिर है। सामान्यतया 'महाकाल' शिव का पर्याय ...
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सिंहस्थ में विशेष असरकारी हैं यह दिव्य और अलौकिक मंत्र, सिंहस्थ के स्नान का पुण्य लाभ दोगुना करते हैं यह मंत्र...
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सिंहस्थ का पुण्य लाभ लेना चाहते हैं तो इन मंत्रों का स्मरण अवश्य करें....
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सिंहस्थ में इन विशेष मंत्रों के साथ कमाएं विशेष पुण्य लाभ...
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आस्था और भक्ति के महापर्व सिंहस्थ पर इन मंत्रों का विशेष महत्व है। शाही स्नान के समय, मेला क्षेत्र में भ्रमण करते हुए या किसी संत समागम के अवसर पर इन मंत्रों को पढ़ना शुभ होता है.... पढ़ें सिंहस्थ के विशेष पौराणिक और दिव्य मंत्र
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वह 'अमृत' की एक बूंद थी जिसने अवंतिका को धन्य कर दिया। यह देवताओं की माया का नतीजा था कि अमृत की 4 बूंदों के गिरने से एक स्थान में अवंतिका या उज्जयिनी शा‍मिल हो गया। यही बूंद, सिंहस्थ में श्रद्धालुओं के समुद्र के रूप में 22 अप्रैल को शाही स्नान ...
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जो दिगन्तव्यापिनी कीर्ति और यश विक्रमादित्य को प्राप्त हुआ, वह यश अन्य किसी राजा को प्राप्त नहीं हुआ। प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुसार विक्रमादित्य ऐतिहासिक व्यक्ति हैं....
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यूं तो सिंहस्थ का पर्व 12 साल में एक बार आयोजित होने की जानकारी सभी को है लेकिन यह बहुत कम लोगों को पता होगा कि सिंहस्थ के इतिहास में ऐसा दौर भी आया जब 2 बार 2-2 साल तक शहर में कुंभ भराया और लोगों ने श्रद्धा के साथ पुण्य सलिला में स्नान किया। ये ...
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पहले के समय में सभी जगहों पर केवल एक ही शाही स्नान होता था और सभी इस निर्णय को मान्य कर वैशाख पुर्णिमा को शाही स्नान करते थे। 1980 के दशक में जब वैष्णव अखाड़ों ने 3 शाही स्नान करने की जिद की तो प्रशासन ने सख्ती दिखाते हुए शहर में धारा 144 लागू कर दी ...
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सम्राट बिंदुसार का पुत्र अशोक उज्जैन का 'गोप्ता' बनकर आया था। ई.स.पू. 273 में जब अशोक साम्राज्य रूढ़ हो जाता है, तब उसने उज्जैन की अनेक प्रकार से उन्नति की; उनका पुत्र महेन्द्र और कन्या संघमित्रा यहां से लंका में धर्म प्रचारार्थ बौद्ध-धर्म दीक्षित ...
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कुंभ मेले के आयोजन के संदर्भ में पर्याप्त पौराणिक तथ्य प्राचीन ग्रंथों में उपलब्ध है। ऐसा कहा जाता है कि एक बार देवताओं और दानवों ने रत्नों की प्राप्ति हेतु समुद्र मंथन किया। इस उपक्रम में उन्होंने सुमेरु पर्वत को मथनी तथा शेषनाग को रज्जु बनाया। ...
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प्राचीन भारत के प्रमुख राजनीतिक और धार्मिक केंद्रों में उज्जयिनी का विशिष्ट स्थान था। इसी कारण इस नगरी ने विभिन्न कालों में विभिन्न नामों को धारण किया। प्राय: प्राचीन संस्कृति के केंद्रभूत नगरों के 2 से अधिक नाम नहीं मिलते, परंतु महाकाल की पुण्यभूमि ...
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पुरातन उज्जयिनी शिप्रा नदी के दोनों तटों पर बसी हूई थी। रम्य उद्यान, विस्तीर्ण चौराहों, मनोहर एवं भव्य विशाल मंदिरों, अमल-धवल राजप्रासादों तथा अट्टालिकाओं के वैभवपूर्ण दृश्यों से चकाचौंध पैदा करने वाली प्राचीन उज्जयिनी आज काल के विशाल उदर में गिरकर ...
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उज्जयिनी, प्राचीनकाल में यह नगर मालव-प्रदेश की राजधानी था। इन दिनों मध्यप्रदेश के अंतर्गत है। इस नगर के भिन्न-भिन्न नाम हैं- विशाला, अवन्ती, अवन्तिका आदि। अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, द्वारावती की तरह अवन्ती, अवंतिका या उज्जयिनी ...
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कुंभ मेला कितना प्राचीन है, इस बारे में कोई निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता। कौन इसके प्रथम उद्बोधनकर्ता थे, इसका पता लगाना भी कठिन है। अमृत कुंभयोग के बारे में शास्त्रों में जितनी चर्चा की गई है, उसका उल्लेख किया जा चुका है। संभवत: आर्य जाति जितनी ...
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अनादिकाल से इस कुंभयोग को आर्यों ने सर्वश्रेष्ठ साक्षात मुक्तिपद की संज्ञा दी है। इन कुंभयोगों में उक्त पुण्य तीर्थस्थानों में जाकर दर्शन तथा स्नान करने पर मानव कायमनोभाव से पवित्र, निष्पाप और मुक्तिभागी होता है- इस बात का उल्लेख पुराणों में है। यही ...
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पौराणिक कथाओं में महाकुंभ

शुक्रवार,फ़रवरी 5, 2016
श्री गोपालदत्त शास्त्री महाराज जो रामानुज सम्प्रदाय के आचार्य हैं, ने एक लघु पुस्तिका 'कुंभ महात्म्य' के नाम से लिखी है, जिसमें 'कुंभ पर्व की प्रचलित तीन कथाएं शीर्षक से जिन कथाओं का उल्लेख किया गया है उनमें सर्वोपरि महत्ता समुद्र-मंथन से सम्बद्ध ...
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कुंभ मेले का आयोजन प्राचीन काल से हो रहा है, लेकिन मेले का प्रथम लिखित प्रमाण महान बौद्ध तीर्थयात्री ह्वेनसांग के लेख से मिलता है जिसमें छठवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के शासन में होने वाले कुंभ का प्रसंगवश वर्णन किया गया है। कुंभ मेले का आयोजन ...
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शैव, वैष्णव और उदासीन पंथ के संन्यासियों के मान्यता प्राप्त कुल 13 अखाड़े हैं। पहले आश्रमों के अखाड़ों को बेड़ा अर्थात साधुओं का जत्था कहा जाता था। पहले अखाड़ा शब्द का चलन नहीं था। साधुओं के जत्थे में पीर और तद्वीर होते थे। अखाड़ा शब्द का चलन ...
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