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प्रवासी कविता : जगमगाते दीयो का संदेश...

मंगलवार,अक्टूबर 22, 2019
Deepawali-poem
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कल ही तो ऊपर सूर्य ग्रहण लगा था। आज नीचे औरत के आकाश का सूर्य ग्रहण हट गया। अब दिखेंगी पगडंडियां पर्दे के पीछे वाली आंखों को भी
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हाला-प्याला की गाथा, वह अद्वितीय लिखने वाला, बिना पीए ही लिख डाला, बच्चनजी ने मधुशाला।
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एक बार कह दिया तो फिर करके दिखाने वाले 'पं. चंद्रशेखर आजाद' को बचपन में एक बार अंग्रेजी सरकार ने 15 कोड़ों का दंड दिया तभी उन्होंने प्रण किया कि वे अब कभी पुलिस के हाथ नहीं आएंगे। वे गुनगुनाया करते थे
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मुझे ऐसा लगे हर सुबह का सूरज आप हैं, अथाह समुंदर कोई और नहीं आप ही हैं पापा, पृथ्वी के माथे लगा चंद्र भी आप हैं,
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मोदी जी का जलवा देखो, वो जीत गए दोबारा, 'चौकीदार चोर है', बिल्कुल झूठा था वह नारा।
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नारी तू नारायणी चलता तुझसे ही संसार है। है नाजुक और सुंदर तू कितनी तुझमें ओजस्विता और सहजता का श्रृंगार है
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स्वच्छ नीला आकाश, चिलचिलाती धूप, देखता ही रह गया, शिशिर का यह रूप। मन मचला कि क्यूं ना, बाहर घूम आऊं, तापमान ऋण तीस, जाऊं तो कैसे जाऊं?
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घास की सख्ती जाती सिमटती आई नमी अब वातावरण में नन्ही ओंस की बूंदें धूप में चांदनी-सी चमके-दमके।
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यह कैसी बसंत ऋतु दिल पर छाई, जब कोमल विचारों की बयार बहती आई। सपनों की पंखुड़ियों पर दस्तक दी निंदिया ने, नीले आकाश तले आरजुएं तितलियों-सी मंडराईं।
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मैंने मंदिर देखा, मस्जिद देखी, चर्च देखा और देखा गुरुद्वारा, मैंने मेरे प्रभु से पूछा, समझा दो क्या है सारा माजरा। तू मदारी या मेरे बंदे मदारी,
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आना-जाना लगा हुआ है, यह है मुसाफिरखाना, थोड़ी देर यहां रुकना है, फिर है सबको जाना। गठरी रखकर सीधा कर लूं, थोड़ा अपना पांव, सात कोस हूं चलकर आया, छूटा मेरा गांव।
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आई खिचारहाई कहीं देश के एक कोने में कहते लोग इसे खिचारहाई, कहीं कहते मकर संक्रांति तो कहीं पतंगबाजी के लिए होती इसमें बेटियों की पहुनाई (मेहमाननवाजी)
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रह गए हैं अब कुछ पल, इस साल के अंत के, होने वाली है नई सुबह, सपनों के संसार की।
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कुछ ही लोगों से सभी का नाता होता है नाता आदर्शों का, प्रेरणा का, सेवाभाव का, देशप्रेम के जज्बे का एक सार्वजनिक नाता, उन कुछ ही लोगों के ब्रह्मतत्व में समाने के बाद भी पीछे रह जाते हैं आदर्श, उनकी प्रेरणाएं, वो अटूट नाते जो और भी गहरे हो जाते हैं। दो ...
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काले घिरे से बादलों को, हवा के तूफानों ने जुदा किया। जो बरसने को थे तैयार उन्हें, आंधी के थपेड़ों ने सुखा दिया।
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जिंदगी की रफ़्तार को कुछ आगे बढ़ाओ, खेलो खतरों से नया कुछ कर दिखाओ। जो बीत गया वह था ही बीतने के लिए, उसे भूल सारा गुबार बाहर निकाल लो।
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चन्द्रमा के दर्शन पर, इफ्तार के आमंत्रण पर। तज़रीद के आवरण में, ज़ुहाद के वातावरण में।
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पुरुषोत्तम मास के देवता श्रीहरि विष्णु हैं। अत: जिन कार्यों के कोई देवता नहीं है तो उनका दान भगवान विष्‍णु को देवता मानकर देने का बहुत महत्व माना गया है।
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एफिल टॉवर को निहारती नजरें। पर खुद में ही खोई हुई हाथों में पेन और डायरी, शायद कुछ लिखने के प्रयास में। पार्क में अकेली बैठी गुहू की तन्द्रा एक आवाज से भंग हुई।
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