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चांद नवाबों के बीच हम

मंगलवार,अगस्त 4, 2015
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कीनिया में मारे गए 147 छात्रों के लिए न हमने मोमबत्तियां जलाईं, न ही हमारी आँखों से दो बूँद आंसू के छलके, न ही इस हत्या के विरोध में किसी ने मुज़ाहिरा ही किया।
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संवाद के अवसर हों, तो बातें निकलती हैं और दूर तलक जाती हैं। मुस्लिम समाज की बात हो तो हम काफी संकोच और पूर्वग्रहों से घिर ही जाते हैं। हैदराबाद स्थित मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूर्निवर्सिटी में पिछली 17 और 18 मार्च को ‘मुस्लिम, मीडिया और लोकतंत्र’ ...
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एग्जिट पोल्स के नतीजों को देखें तो अरविन्द केजरीवाल ने अपनी पार्टी को दिल्ली का सबसे बड़ा “पॉवरहाउस” बना दिया है। महज दो साल पहले बनी पार्टी ने वो कुछ कर दिखाया है जिसको बड़ी पार्टियाँ सालों में हासिल नहीं कर पाती हैं।
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एक थी शहजादी...

शनिवार,दिसंबर 27, 2014
वो एक डॉक्टर थी जो उस दिन अपने दफ्तर से घर आ रही थी। अचानक कुछ ऐसा हुआ कि आस-पास की जमीन तक थरथरा गई। उस पर एसिड से हमला किया गया था।
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रोचक अंदाज में 'मीडिया लाइव'

शनिवार,दिसंबर 27, 2014
रत्नेश्वरसिंह अपनी पुस्तक 'मीडिया लाइव' में ने इलेक्ट्रानिक मीडिया यानी टेलीविजन, रेडियो और बेवसाइट्स को एतिहासिकता में परखते हुए वर्तमान स्थिति को दिखाया है। ऐतिहासिकता इस वजह से कि रत्नेश्वर कई स्थियों को पौराणिकता से जोड़कर देखते हैं। अपनी किताब ...
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मीडिया भी सीखे 'कुछ' सबक

बुधवार,दिसंबर 24, 2014
सबको सीख देने वाला मीडिया अपनी गति के साथ आगे बढ़ते हुए अपनी कमियों को जानने और परखने का माद्दा भी रखता है। शायद इसलिए भी वह लोकतंत्र का एक मजबूत स्तंभ है। भारत में मीडिया की उम्र अब परिपक्वता के दायरे में आ चुकी है। इसलिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने ...
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नई दिल्ली। इंस्टेंट कमेंट्स, इंस्टेंट रिएक्शंस, लाइक्स, अनलाइक्स, इंस्टेंट एवरीथिंग। हम आजकल इसी इंस्टेंट काल में जी रहे हैं। हमारे पास सोचने-समझने का वक्त नहीं है और न ही किसी बात पर विचार-विमर्श का वक्त है। इस फटाफट के दौर में सोच और विचार की तमाम ...
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सन् 2005 से हिन्दी ब्लॉगिंग में अपनी सक्रियता के नाते मैंने भी अनेक अवसरों पर कहा है कि ब्लॉगिंग साहित्य की एक स्वतंत्र विधा बन सकती है। किंतु आलोक कुमार रचित पहले हिन्दी ब्लॉग के बाद के 8 सालों में हम उसे 'विधा' बनाने में नाकाम रहे हैं। वह ...
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एक बात, जो प्रायः मुझे उलझन में डालती है, वह है हम हिन्दी ब्लॉगरों के बीच स्वयं को साहित्य-सर्जक कहलाने की आकांक्षा। यह आकांक्षा अन्य भाषाओं के ब्लॉगरों में दिखाई नहीं देती। हां, वे इस माध्यम को साहित्य तथा पत्रकारिता में 'योगदान' देने वाला, उसकी ...
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हिन्दी ब्लॉगिंग ने न सिर्फ इंटरनेट, बल्कि जनसंचार के माध्यमों तथा रचनाकर्म के बीच भी अलग पहचान और जगह बनाई है। हिन्दी रचनाकर्म के क्षेत्र में ठहराव और शीतलता के बीच ब्लॉगिंग, जो कि वास्तव में एक तकनीकी परिघटना तथा माध्यम मात्र है, ने वह हलचल और ...
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विनोद दुआ का क्लारनेट

शुक्रवार,अक्टूबर 10, 2014
सन 1987 का स्मृति बक्सा खोलने से पहले 15 अगस्त 2014 का एक छोटा सा प्रसंग बताता हूं। इस दिन राष्ट्रपति भवन में सायंकाल एक विराट जलपान का आयोजन राष्ट्रपति जी की ओर से किया जाता है, जिसमें पद्म सम्मानों से अलंकृत सभी व्यक्तित्वों के साथ शासन और प्रशासन ...
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एक थी अमीना। वह हर रोज़ आधी रात तक अपने शौहर अहमद का इंतज़ार किया करती थी। अहमद यारों की महफ़िल से लौटता, घर पहुंच कर सो जाता और फिर निकल जाता। न जाने कितने साल यह सिलसिला चलता रहा। अमीना ने कभी नहीं पूछा कि वह कहां जाता है और किनके साथ शाम गुज़ारता ...
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बहुत से लोग आम आदमी तक पहुँचने के लिए सोशल मीडिया और दूसरे संवादात्मक माध्यमों के इस्तेमाल के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तथाकथित ऑब्सेशन पर हैरत जाहिर करते हैं। असल जिंदगी में चुप्पी और वर्चुअल दुनिया में अति-सक्रियता? मोदी मीडिया से भी दूरी बनाए ...
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अख़बार या बाहुबली

गुरुवार,सितम्बर 25, 2014
बाहुबली! जो अपनी शक्ति के नशे में इतना चूर हो कि दूसरों पर हमला करना वह अपना अधिकार समझने लगे। कुछ क्षेत्रीय स्तर के अख़बारों और उनके मालिकों/ मातहतों में यह प्रवृत्ति दिखती रही है मगर राष्ट्रीय अख़बारों, जिन्हें उनका पाठक अपना दोस्त मानता है, उसके ...
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लोकसभा चुनाव 2014 में राजनीतिक पार्टियों और नेताओं का भविष्य दांव पर लगा हुआ है इसके साथ साथ बहुत कुछ कसौटी पर है, बहुत सारे नेताओं और राजनीतिक पार्टियों की परीक्षा हो रही है। इस चुनाव में सबसे ज़्यादा कठिन परीक्षा से मीडिया को गुजरना पड़ रहा है। सभी ...
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जो दुनिया हम बना रहे हैं...

शनिवार,सितम्बर 6, 2014
1980 में प्रकाशित अपनी किताब ‘द थर्ड वेव’ में ऐल्विन टॉफलर ने लिखा है कि मानव सभ्यता के इतिहास में पहली लहर कृषि क्रांति के साथ आई जिससे उसके पहले की सारी जीवन पद्धति उलट-पलट गई। दूसरी लहर औद्योगिक क्रांति के साथ आई जिसने खेतिहर समाजों की व्यवस्था ...
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मोदी अपने ऑडियंस को भलीभांति जानते हैं। जिनको भी इस बात की शिकायत थी कि मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद बहुत कम बात करते हैं, सवालों का जवाब नहीं देते हैं, ट्विटर पर ट्वीट नहीं करते हैं, फ़ोन पर मैसेज कम करते हैं, उन सबके सवालों का जवाब मोदी ने अपनी ...
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गंगा बहती हो क्यों..?

शुक्रवार,अगस्त 29, 2014
नदियां और सभ्यता संस्कृति के बीच संबंधों को लेकर सबने कुछ न कुछ जरूर पढ़ा-सुना होगा। स्कूलों में तो भूगोल कि किताबों में बार-बार गंगा का मैदान पढ़ने को मिला था और पटना का होने के नाते मैं थोड़ा बहुत समझ भी पाता था। उत्तर बिहार में तो नदियों का जाल ...
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर हमेशा यह चर्चा रहती है कि मीडिया को लेकर वह बहुत सहज नहीं हैं, खासकर ख़बरिया टेलीविज़न चैनल्स को लेकर। यह आज के संदर्भ में मीडिया के लिए बेहद चिंता की बात हो सकती है मोदी के लिए नहीं, क्योंकि मीडिया हमेशा बड़ी ख़बर को ...
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