तेरे खुशबू में बसे ख़त...याद कीजिए प्रेमपत्र का ज़माना

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वॉट्‍सएप, फेसबुक, ई-मेल आधुनिक तकनीक की विशाल देन हैं। इसके आने से तो जैसे चमत्कार हो गया ह। पलक झपकते ही कोई भी संदेश दुनिया के किसी भी कोने में पहुंचाया जा सकता हैं, मानो जैसे पूरी दुनिया इस छोटे से डिब्बे (कम्प्यूटर) में समा गई हो पर फिर भी ख़त की अहमियत कई मायनों में ज्यादा थी, क्योंकि उससे हमारे अहसास जुड़े थे।

भले ही नई पीढ़ी के लिये 'ख़त' शब्द धुंधला सा गया हो लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके चहरे पर इस शब्द का ज़िक्र होते ही चमक आ जाती है, क्योंकि ख़त से इनकी खूबसूरत यादें जुड़ी हैं।

अक्सर घर में बड़ों की बातों में इस लफ्ज़ को खूबसूरती को महसूस किया है, लेकिन इस पीढ़ी को इसकी मिठास को कभी चखने का मौका ही नहीं मिला। वो हफ्तों तक डाकिये का इंतज़ार, डाकिये की आवाज़ की पुकार, उसके हाथों में हमारी चिठ्ठी और चिठ्ठी में छुपा अपनो का प्यार। दादा जी अक्सर किस्से सुनाते हैं, कैसे वो घंटो तक दादी जी के का इंतज़ार करते थे, घर वालो से छुपकर कैसे डाकिये को दोस्त के घर चिट्ठी छोड़ जाने को कहते थे, कैसे वो दादी जी की चिट्‍ठी को बार बार पढ़ते और फिर तकिये के नीचे रखकर सो जाते थे।

जब वक्त निकालकर कोई अपनी भावनाओं को शब्दों का रूप देता है। हर एहसास को लिखने से पहले उससे खुद गुज़रता है, अपनी अनमोल पूंजी की तरह हर एक कागज़ के टुकड़े को उम्र भर संभाल कर रखता है और फिर एक दिन जब याद आये उसे लिखने वाले की तो यादों की दुनिया में खो जाता है।

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क्या आपको याद हैं आपने आखिरी बार किसी को पत्र कब लिखा था? अपनी स्टडी ैबल पर बैठकर किसी की याद में कलम और कागज़ को कब सजाया था? आज की पीढ़ी से अगर पूछा जाये तो यकीनन जवाब "ना" ही होगा, लेकिन 80 के दशक में जन्में लोगों की बात करें तो उन्होंने आधुनिक तकनीक के साथ ही प्रेम पत्र लिखने की कला को भी काफी करीब से समझा है। वे इस चीज़ का महत्व ज़्यादा जानते हैं। उन्होंने इस एहसास को करीब से िया है, जबकि 90 के दशक में जन्में लोग तो केवल "ईमेल" के बारे में ही जानते हैं। खत लिखने के खूबसूरत अहसास के बारे में तो उन्होंने सिर्फ सुना ही है।

हम भले ही तकनीकी रूप से कितनी ही तरक्की कर लें, लेकिन यह मानना ही होगा प्रेमप‍त्र का विकल्प दुनिया में नहीं हो सकता, क्योंकि यह सीधा उन लोगों के अहसासों से जुड़ा है, जिन्होंने इन्हें लिखा है और जिनके लिए लिखा है।

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