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बाल दिवस : बच्चों, तुम्हें गंदे स्पर्श, पकड़ और अश्लील इशारों को समझना होगा

बुधवार,नवंबर 13, 2019
a letter to kids
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हां, मैं बदल रहा हूं अपने माता-पिता, भाई-बहन, जीवनसाथी, बच्चों और दोस्तों से प्यार करने के बाद, अब मैं खुद से प्यार करने लगा हूं।
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गुलजार ने नज्में लिखीं, तो कहानियां छपीं। गीत लिखे, तो निर्देशन में आ गए। कहा‍नियां लिखीं, तो पटकथाओं में ख्याति पाई। ऐसा ही कुछ सिलसिला अब तक जारी है।
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गुलमोहर, तुम्हारे इस तरह जाने के बाद भी शांत और स्थिर कुछ नहीं हुआ। सब बेचैन हैं, पीपल, नीम, आम और जर्जर चंदन सब खामोश खड़े हैं हाथों को बांधे, सिर को झुकाए लेकिन एक अशांत आर्तनाद और अस्थिर मन अब भी मेरे आसपास भटक रहा है।
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औरत, महिला, स्त्री, नारी, खवातीन या वामा। पुकारने के लिए कई शब्द हैं, लेकिन महसूसने के लिए? कुछ भी नहीं, एक रिक्तता, जड़ता, खिन्नता, खिंचाव, खुश्की या फिर खीज। इस वक्त लेखनी की नोक पर आने को बेताब, आकुल और व्यग्र हैं। वे समस्त महिलाएं जो यूं तो कई ...
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जरात में घर-घर लोग पतंगबाजी का मजा लेते हैं। इस दिन पूरा परिवार घर की छत पर जमा हो जाता है। यदि आसमान से नीचे देखा जा सके तो पता चलता है कि सिर्फ पुरुष वर्ग ही नहीं महिलाएं भी पतंग उड़ा रही हैं।
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दोस्ती एक ऐसा आकाश है जिसमें प्यार का चंद्र मुस्कुराता है, रिश्तों की गर्माहट का सूर्य जगमगाता है और खुशियों के नटखट सितारे झिलमिलाते हैं। एक बेशकीमती पुस्तक है दोस्ती, जिसमें अंकित हर अक्षर, हीरे, मोती, नीलम, पन्ना, माणिक और पुखराज की तरह है, ...
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इंदौर। इंदूर ने अपने नाम को सार्थक करते हुए हिंदी साहित्य जगत के दिव्यमान नक्षत्र 'डॉ. प्रभाकर माचवे जन्मशती' समारोह पूर्ण गरिमा के साथ मनाया गया। इस मौके पर मराठी भाषी होने के बावजूद हिंदी के दिव्य नक्षत्र को पूरी शिद्दत के साथ याद किया और ...
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एक नन्हा सा दीप। नाजुक सी बाती। उसका शीतल सौम्य उजास। झिलमिलाती रोशनियों के बीच इस कोमल दीप का सौन्दर्य बरबस ही मन मोह लेता है। कितना सात्विक, कितना धीर।
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कोर्ट फैसले के बाद मैं और मेरे जैसे बहुत से लोग यह जानना चाहते हैं फिर तुम मरी कैसे? तुम्हें मारा किसने? फिल्म पर भरोसा कर लें? किताब में लिखा हुआ सच मान लें?
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इस बार मुझे मत जलाइए : रावण

गुरुवार,सितम्बर 28, 2017
मेरी मृत्यु को नौ लाख वर्ष हो गए हैं। इतनी सुदीर्घ अवधि पश्चात भी लग रहा है जैसे मेरा निर्वाण अभी कल ही की बात है, क्योंकि इन नौ लाख वर्षों में भी आप मेरे पाप को कहां क्षमा कर पाए हैं।
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इस मोहक मनभावन त्योहार पर इस बार बांधें कुछ ऐसी राखियों को जो हर भाई-बहन के जीवन जीने का अंदाज बदल दें.... यह राखी ....पढ़ें विस्तार से...
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'काश होती मैं एक चिड़िया...! जैसे उड़ आई बाबुल के आंगन से फिर उड़ जाती... ...और बैठ जाती माटी की अनगढ़ लाल मुंडेर पर देती आवाज पूजाघर में चंदन घिसती दादी को, पिंजरे में कटोरी बजाते हीरामन तोते को, चारे के लिए रंभाती श्यामा गाय को....
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एक बार फिर से जगत जननी मां दुर्गा के लिए कुछ लिखूं ऐसा दिल किया। क्यूंकि जब जब नवरात्रियां आती है, चिंतन-मनन, ध्यान, पूजा पाठ का माहौल नजर आता है। (जी हां, नवरात्रियां... क्यूंकि एक चैत्र की नवरात्रि होती है और दूजी शारदीय नवरात्रि, जिसमें बड़ी भक्ति ...
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अम्माजी आतीं, चोंच में दाने समेटतीं और चूजों को दाना खिलातीं, उसे चोंच में भरकर पानी ले जाते भी हमने यह चोंचलेबाजी देखी। पर यह चोंचलेबाजी बहुत दिनों तक नहीं चली। चूजे बड़े हो गए। वे अपने पर खोलने लगे। घोंसले से बाहर उड़ने लगे। खुद दाने चुगने लगे और ...
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वसंत के आगमन पर वृक्षों की पत्तियां, इस मौसम के अभिवादन के लिए जमीन पर बिछ जाती हैं। वहीं टेसू के फूल भी खिलने लगते हैं। सूखे पहाड़ों पर बिना पत्ती के वृक्ष अपनी वेदना आखि‍र किसे बताएं ?
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बच्चों का आपस में जो रिश्ता होता है, वह चाहे जैसा भी हो, लेकिन उन रिश्तों में कभी नकारात्मकता नहीं होती। वे जब एक-दूसरे से मिलते हैं, कभी प्यार से खेलते हैं तो कभी आपस में झगड़ भी लेते हैं। लेकिन अगले ही कुछ घंटों में वापस उसी तरह प्यार से साथ रहते ...
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जिन चीज़ों के लिए महीनों का इंतज़ार किया जाता था, अब वे सभी चीजें दैनिक जि़ंदगी का हिस्सा बनकर रह गईं हैं। उत्सुकता को जन्म देती वे सारी बातें, जो कभी उत्सव से कम नहीं होती थी, अब एक सामान्य क्रिया होकर रह गई है। देखा जाए तो इस परिवर्तन से हमारे ...
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बारिश की हल्की फुहारों से मौसम का आगाज़। बारिश का मौसम कभी रोमांस, प्रेमी युगल की दूरियों के एहसास से जुड़ा होता है, तो कभी बच्चों, युवाओं की मस्ती और हरे-भरे पिकनिक स्पॉट की याद दिलाता है। लेकिन बारिश के मौसम की शुरूआत से जुड़ी कुछ ऐसी यादें भी है, ...
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अरविंद वह तुम ही थे जिसमें अचानक युवा वर्ग की दिलचस्पी बढ़ी थी। अच्छा लगता था जब तुम अन्ना के कान में कुछ फुसफुसाने आते तो लगता एक विश्वासपात्र कुछ सलाह दे रहा है। आंदोलन के रणनीतिकार के रूप में भी तुम भले ही लगे थे। अचानक तुम्हारी गूगल सर्च बढ़ी ...
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