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कैप्‍टन हर्षन: वतन की राह पर कुर्बान

शुक्रवार,जनवरी 25, 2008
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करीब दो साल पहले एक शॉर्ट फिल्‍म अगल-अलग चैनलों पर दिखाई जाती थी। फिल्‍म में किसी महानगर की एक सड़क है, जिसके इर्द-गिर्द फुटपाथ पर गोलगप्‍पे, अखबार वाले सभी जमे हुए हैं। स्‍कूल से माँ के साथ लौटती बच्‍ची गोल-गप्‍पे खाने के लिए मचल उठती है। इसी बीच
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एकला चलो रे...

शुक्रवार,जनवरी 25, 2008
एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे! यदि केऊ कथा ना कोय, ओरे, ओरे, ओ अभागा, यदि सबाई थाके मुख फिराय, सबाई करे भय- तबे परान खुले ओ, तुई मुख फूटे तोर मनेर कथा एकला बोलो रे! यदि सबाई फिरे जाय, ओरे, ओरे, ओ अभागा, यदि गहन पथे जाबार काले केऊ
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किसी भी स्थिति को देखने के लिए दृष्टिकोण दो तरह का हो सकता है। एक, स्थूल या सतही या दो, सूक्ष्म और गहरा। दैनंदिनी जीवन में देश की आजादी यदि सर्वव्यापी दिखाई दे रही है तो यह उसका एक पक्ष है। सूक्ष्म दृष्टि बार-बार इस अहसास को दोहराती है
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संविधान निर्माण के समय, संविधान सभा की बहसों में कहा गया था कि मूलाधिकारों के प्रावधान ऐसे प्रावधान हैं, जो देश के नागरिक को जन्मता प्राप्त होंगे तथा राज्य को इन्हें उपलब्ध कराना व इनकी सुरक्षा भी करना बाध्यकारी
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गत दिनों जब सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने संविधान की नौवीं अनुसूची की न्यायिक समीक्षा के मामले पर बहस करते हुए अपनी राय कायम की तो एक बार फिर 1973 में केशवानंद भारतीय मामले का ऐतिहासिक निर्णय ताजा हो गया
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संविधान की खास बातें

शुक्रवार,जनवरी 25, 2008
11 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की बैठक में डॉ. राजेंद्रप्रसाद को स्थायी अध्यक्ष चुना गया, जो अंत तक इस पद पर बने रहे। 13 दिसंबर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान का उद्देश्य प्रस्ताव सभा में प्रस्तुत किया
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मैं आपका अपना राष्ट्रध्वज बोल रहा हूँ। गुलामी की काली स्याह रात के अंतिम प्रहर जब स्वतंत्रता का सूर्य निकलने का संकेत प्रभात बेला ने दिया, तब 22 जुलाई 1947 को भारत की संविधान सभा के कक्ष में पं. जवाहरलाल नेहरू ने मुझे विश्व एवं भारत के नागरिकों
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फिल्म में 'वंदे मातरम्‌'

शुक्रवार,जनवरी 25, 2008
फिल्म 'आनंदमठ' सन्‌ 1952 में आई थी। वह सुप्रसिद्ध बंगला साहित्यकार बाबू बंकिमचंद्र चटर्जी के 'आनंदमठ' उपन्यास पर आधारित थी। फिल्मीस्तान कंपनी द्वारा निर्मित इस फिल्म में पृथ्वीराज कपूर, गीता बाली, भारत भूषण, प्रदीप कुमार, अजीत व मुराद जैसी हस्तियों
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'वंदे मातरम्'

शुक्रवार,जनवरी 25, 2008
ब्रिटिश शासन के दौरान देशवासियों के दिलों में गुलामी के खिलाफ आग भड़काने वाले सिर्फ दो शब्द थे- 'वंदे मातरम्'। बंगाली के महान साहित्यकार श्री बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के ख्यात उपन्यास 'आनंदमठ' में वंदे मातरम् का समावेश किया गया था।
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जन गण मन....

शुक्रवार,जनवरी 25, 2008
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित गीत 'जन गण मन... ' को संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया। यह गीत सबसे पहले 27 दिसंबर 1911 को कलकत्ता में हुए भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था।
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निगेहबान हैं आँखें

शुक्रवार,जनवरी 25, 2008
उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता जिस मुल्क की सरहद की निगेहबान हैं आँखें हर तरह के जज्बात का, ऐलान हैं आँखें शबनम कभी शोला कभी, तूफान हैं आँखें आँखों से बड़ी कोई तराजू नहीं होती तुलता है बशर जिसमें, वह मीजान है आँखें
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भारत की अखंडता के महत्व को बताते हुए वीर सावरकरजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि यदि मुसलमान पाकिस्तान के लिए कृतनिश्चय हो तो हिन्दू को कमर कसना होगी। उन्हें
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स्वराज्य आखिरी मंजिल नहीं

शुक्रवार,जनवरी 25, 2008
मुबारक हो आपको, नए भारत की सालगिरह को आज सात वर्ष हुए। इस नए भारत को पैदा हुए, हमारी आजादी को सात वर्ष हुए। हम हर साल यहाँ लाल किले की दीवारों के नीचे इस वर्षगाँठ को मनाते हैं, क्योंकि यह सालगिरह हम सबों की है
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राममनोहर लोहिया की राय

शुक्रवार,जनवरी 25, 2008
मजहब और सियासत का रिश्ता ठीक तरह से अभी तक समझा नहीं गया है। हमारी बिरादरी ने भी नहीं समझा। मैं तो, साफ बात है, खुदा और ईश्वर के मामले में थोड़ा-सा कमजोर आदमी हूँ। शायद, उन लोगों ने भी उसे नहीं समझा जो खुदा और ईश्वर को बहुत अहमियत देते हैं।
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स्वतंत्रता बनाम स्वराज्य

शुक्रवार,जनवरी 25, 2008
कहा जाता है कि स्वतंत्रता का प्रस्ताव, लार्ड बर्कनहैड का माकूल जवाब है। यदि यह गंभीर दावा है, तो हमें इसका पता ही नहीं है कि सुधार जाँच कमीशन बैठाने का और उसकी नियुक्ति की घोषणा के समय की परिस्थिति का क्या जवाब होना चाहिए।
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सरदार पटेल का भाषण

शुक्रवार,जनवरी 25, 2008
अपना छोटा सा भाषण शुरू करने से पहले मैं पंडित मोतीलालजी के स्वर्गवास से श्रीमती स्वरूपरानी नेहरू, पंडित जवाहरलाल और उनके परिवार को हुई भारी हानि के लिए सम्मानपूर्वक संवेदना प्रकट करना चाहता हूँ। मुझे विश्वास है इस बात से उनका शोक कुछ हलका
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आशा के साथ भविष्य का सामना

शुक्रवार,जनवरी 25, 2008
मित्रो! अपनी मातृभूमि के स्वाधीनता संग्राम में हमने जिस संकट की कभी कल्पना भी नहीं की थी, वह हम पर आ पड़ा है। आप शायद यह अनुभव करते हैं कि आप भारत को स्वतंत्र करने के अपने ध्येय में विफल हो गए हैं, लेकिन मैं यह कहूँगा कि यह
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भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 26 जनवरी 1950 को भारतीय गणराज्य के राष्ट्रपति पद की शपथ ली। उस अवसर पर उन्होंने कहा- 'हमारे गणराज्य का उद्देश्य है इसके नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता और समता प्राप्त करना तथा इस विशाल देश
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1857 की महान क्रांति के बारे में मैंने इधर कई किताबें पढ़ी हैं। मेरे खयाल में यह घटना अपने आप में बहुत बड़ी नहीं थी। इतिहास की और बड़ी घटनाओं की तरह ऐसा हुआ कि यह घटना भी कुछ पहले होने वाली और बाद में होने वाली परिस्थितियों के कारण उस समय देश
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