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वसंत पंचमी पर कविता : ऋतुओं का राजा है 'वसंत'

सोमवार,जनवरी 27, 2020
Vasant panchami
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Girl Child Day : 'बेटी' युग का नया दौर

शुक्रवार,जनवरी 24, 2020
बेटी युग में खुशी-खुशी है, पर मेहनत के साथ बसी है। शुद्ध कर्म-निष्ठा का संगम, सबके मन में दिव्य हंसी है।
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जिस दिन से घर में आती हैं बेटियां, माता-पिता की इज्जत बन जाती हैं बेटियां। भारत के विकास की डोर थामे हैं बेटियां,
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गणतंत्र के इतने वर्षों में, क्या खोया क्या पाया है....खोने की तो फिक्र नहीं, पाने की चाह सब रखते हैं...सदियों के तप के बाद मिली, आज़ादी की नेमत हमको..
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गणतंत्र दिवस दिन वे निराले स्वर्णाक्षरों में है जिन्हें इतिहास संभाले इनके लिए हर भारतीय मन में है सम्मान इनने ही दिए हमको अंधेरों में उजाले फूले फले समृद्ध हो
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गणतंत्र दिवस फिर आया है। नव परिधान बसंती रंग का माता ने पहनाया है। भीड़ बढ़ी स्वागत करने को बादल झड़ी लगाते हैं। रंग-बिरंगे फूलों में ऋतुराज खड़े मुस्काते हैं। धरनी मां ने धानी साड़ी पहन श्रृंगार सजाया है।
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मैं एक सुबह उठकर निकल पड़ता हूं कार्यालय के लिए दौड़कर मेट्रो को पकड़ता हूं
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कि देखो, फागुन भी टोह ले रहा और खेतों की मेड़ पर उग आईं हैं टेसू चटकाती सुर्ख होती डालियां तो किसी शीत भरी पर गुनगुनी शाम की तरह गुज़र जाओ इस गली अंजुली भर गरमाहट लेकर आभासों के मेरे सूरज मन की मकर राशि में छा जाओ देव ...
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वह पहली छत के दरवाजे की चौखट थामे मांगती रही सदा उसके हिस्से का आकाश उड़ाने के लिए अपनी पतंग! फकत मांगने से, नहीं मिला कभी उसे उसके हिस्से का आकाश और उड़ा न सकी वह आज तक अपनी कोई पतंग ! उस दूसरी ने कभी नहीं मांगा आकाश का कोना बस ...
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आई खिचारहाई कहीं देश के एक कोने में कहते लोग इसे खिचारहाई, कहीं कहते मकर संक्रांति तो कहीं पतंगबाजी के लिए होती इसमें बेटियों की पहुनाई (मेहमाननवाजी)।
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महानगर के व्यस्ततम सड़कों पर घने कोहरे और हड्डियों को कंपा देने वाली शीत के मध्य बड़ी-बड़ी गाडियों में लोग गतिमान हैं
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उठो, सबेरा हुआ चांद छुप गया रंग बदल गया भानु दस्तक देने लगा दरवाजे पर चिड़ियों की चहचाहट
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यह सर्दी बरपा रही है कैसा कहर। आलम को गिरफ्त में लिए है शीतलहर। ठिठुरन के आगोश में हर बस्ती, गांव, शहर। पारा और भी गिर-गिर जाता है शामो-सहर।।1।।
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New Year 2020 Poem- स्वागत को तैयार रहो तुम। मै जल्द ही आने वाला हूं। बारह महीने साथ रहूंगा। खुशियां भी लाने वाला हूं।
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हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय! मैं शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार-क्षार। डमरू की वह प्रलय-ध्वनि हूं जिसमें नचता भीषण संहार।
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खून क्यों सफेद हो गया? भेद में अभेद खो गया। बंट गए शहीद, गीत कट गए,
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शहर के तमाम बुद्धिजीवियों कथाकारों और कवियों ने हिन्दुस्तान की समस्याओं को लेकर संगोष्ठी की मंच पर हिन्दुस्तान का नक्शा लगा हुआ था
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महाराष्ट्र में तीन होटलों में रुकी थी तीन बारातें। बारातियों से बाहर वालों के मिलने के लाले थे || क्योंकि अन्दर की सरगर्मी थी गोपनीय, पर्दे में,
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अंततः मुबारक महाराष्ट्र को एक तिमुही सरकार। एक राजनीतिक मंडप जिसके हैं तीन मुख्य द्वार ||
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भोपाल गैस त्रासदी पर कविता- आर्तनाद, चीखें अंधे, बहरे चमड़ी उधड़े चेहरे लाखों मासूमों को जो आज भी
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