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अगर आप डिप्रेशन में नहीं है तो भी आपको शाहीन भट्ट की यह किताब पढ़ना चाहिए

रविवार,दिसंबर 15, 2019
आई हैव नेवर बीन (अन) हैप्पियर’
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बेग़म अख़्तर ग़ज़ल को वो इज्‍जत नहीं दिला पाती तो ग़ज़ल के नए दौर में हमें न तो जगजीतसिंह मिलते और न ही मेहदी हसन मिल पाते। एक तवायफ की साहबजादी होने के बावजूद कोठों की चाहरदीवारी से बाहर निकालकर ग़ज़ल को संभ्रात परिवारों और महफिलों में लाने का श्रेय ...
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भारत में ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनसे साबित होता है कि छोटे स्टार्टअप कालांतर में बड़े कारोबार में तब्दील हो सकते हैं। एक छोटी-सी शुरुआत से बड़ी उपलब्धि हासिल की जा सकती है।
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कवि हमेशा सीमाएं तोड़ता है, वे चाहें जिस भी प्रकार की हों- राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक अथवा आर्थिक। मनुष्य सामाजिक प्राणी है और समाज के बिना उसका काम नहीं चलता इसलिए वह सामाजिक नियमों में आसानी से बंध जाता है।
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जैसा कि नाम से ही कुछ-कुछ आभास होने लगता है, 'शकुनि: मास्टर ऑफ़ द गेम' का लेखन महाभारत के कुटिल पात्र शकुनि को केंद्र में रखकर किया गया है। शकुनि को महाभारत में एक खलनायक की छवि प्राप्त है और उसे महाभारत के युद्ध और कौरवों के सर्वनाश का कारण माना ...
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ऐसा अद्भुत उपन्यास बहुत कम पढ़ने को मिलता है। हिन्दी साहित्य में तो मैंने पहला ही पढ़ा है। समसामयिक, दुर्लभ, नाजुक, गंभीर और चिंतनशील विषय का कुशलता से निर्वाह किया गया है।
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उर्दू पत्रकारिता की अहमियत से किसी भी सूरत में इंकार नहीं किया जा सकता। पत्रकारिता का इतिहास बहुत पुराना है या यूं कहें कि जब से इंसानी नस्लों ने एक-दूसरे को समझना और जानना शुरू किया
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यह एक पत्रकार का पहला उपन्यास है। लेकिन यह कल्पना और यथार्थ के बीच ऐसे झूलता है, जैसे अच्छी कला झूलने की कोशिश करती है। भविष्य की गोदी में निडर होकर कूदने वाली इस कहानी की धुरी है सन् 1974 में
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गेइशा! जापान के इतिहास का और तात्कालीन जापानी समाज जीवन का एक अटूट अंग।इशा शब्द का शब्दशः अर्थ है 'कलाकार' पुरुषों को रिझाने वाली, उनका मनोरंजन करने वाली स्त्री।
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लेखक और मीडिया शिक्षक डॉ. सौरभ मालवीय की पुस्तक 'विकास के पथ पर भारत' मोदी सरकार की महत्वपूर्ण योजनाओं का दस्तावेज है।
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'यायावर हैं आवारा हैं बंजारे हैं', ये किताब हाथ में लेते ही मुझे बहुत भा गई। सुंदर कवर, हल्का वजन और गोल्डन स्याही से लिखा हुआ लेखक और किताब का नाम।
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वाणी बुक कंपनी, वाणी प्रकाशन के अंग्रेज़ी उपक्रम द्वारा डॉ. संजय कुमार की पुस्तक 'कटिहार टू कैनेडी : द रोड लेस ट्रैवेल्ड का लोकार्पण 5 अप्रैल को इण्डिया इंटरनेशनल सेण्टर में किया गया। पुस्तक लोकर्पण के उपरांत एक परिचर्चा का आयोजन किया गया जिसका विषय ...
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पत्रकार पुष्पेंद्र वैद्य की ताज़ा किताब "द ट्रुथ बिहाइंड ऑन एयर" इन दिनों सुर्ख़ियों में है। यह किताब बीते पच्चीस सालों में भारतीय मीडिया के बदलने का दस्तावेज ही नहीं है, उसके नैतिक पतन की बानगी भी रोचक किस्सों में बयान करती है। इसमें पत्रकारिता के ...
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गुंटुर शेषेन्द्र शर्मा द्वारा विरचित 'षोडशी' भारत के विमर्शात्मक साहित्य को वैश्विक वाङ्मय में स्थापित करने वाला अत्युत्तम ग्रंथ है। 'षोडशी' नाम स्वयं महामंत्र से जुड़ा हुआ है।
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कुल दस अध्यायों में बंटी इस पुस्तक के केंद्र में निश्चित तौर पर गांधीजी की सत्यता और अहिंसा संबंधी प्रयोगों की व्याख्या है।
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ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हिन्दी के कवि, संपादक और संगीत अध्येता यतीन्द्र मिश्र द्वारा संपादित बेग़म अख़्तर, अख़्तरी बाई के जीवन और संगीत पर आधारित पुस्तक ‘अख़्तरी : सोज़ और साज़ का अफ़साना’का लोकार्पण किया गया। यह किताब अख़्तरी ...
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कविता अपने ख़्यालात, अपने जज़्बात को पेश करने का एक बेहद ख़ूबसूरत ज़रिया है। प्राचीनकाल में कविता में छंद और अलंकारों को बहुत ज़रूरी माना जाता था, लेकिन आधुनिक काल में कविताएं छंद
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निश्चित रूप से विराट उस मुकाम तक पहुँच चुके हैं जहाँ किसी रचना के जिक्र भर से उनकी स्मृति ताजा हो जाए। इन दोहों में जीवन और समाज की शाश्वत उलझनें कवि ने सहजता से सुलझा कर रख दी।
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नेहरू और एडविना दोनों इंसान थे, दोनों नेतृत्व का गुण रखने वाले रोमांटिक प्राणी थे, और दोनों अपने-अपने ढंग से भारत को समर्पित थे। पर नेहरू का समर्पण देश, धर्म, जा‍ति़, संस्कार, समाज, मानवता के लिए था।
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कहानीकार मनीष वैद्य के कहानी संग्रह 'फुगाटी का जूता' को मप्र हिंदी साहित्य सम्मलेन का वागीश्वरी सम्मान तथा शब्द छाप सम्मान प्रदान किया गया है। पढ़िए समीक्षा।
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